ULTIMATE TRUTH OF LIFE-ज़िन्दगी झांट

                      

ज़िन्दगी झांट

किसी जगह धीरे धीरे कुछ झांट के बाल उगने लगे ।
शुरू शुरू में तो कुछ ही थे , तो सब चुपचाप बढ़ रहे थे और अपने आस पास और ज्यादा के उगने का इंतज़ार कर रहे थे ।पहले तो अपनी गिनती बढते देख खूब खुश हुए । जहाँ देखो ,वहां बाल ही बाल।
उससे आगे दिखता नहीं था । लगा कि यही दुनिया है और इसका खुदा तो मैं  भी बन सकता हूँ ।
किसी दिन गलती से शैम्पू की कुछ बुँदे कुछ बालों  पर टपक गयी ।वो जरा मुलायम मुलायम से हो गए ।
“कुछ तो खास है यार मुझमे । “ऐसा कईयों को लगने  लगा । 
वैसे बूंद तो कहीं भी ,किसी पे भी टपक सकती थी ।
जब वो खूब बढ़ गए ,तो एक दुसरे में उलझने लगे ।
एक बड़ा लम्बा बाल बोला” अबे, दूर हट साले ,अपनी औकांत देख ,नाख़ून भर का है नहीं, ऊँगली भर बाल से भिड़ने चला है “
आजकल अपने को छोटा कौन समझता है ?छोटू ने दो चार नंगी गालियाँ चिपका दी ।
लम्बू के दिल पे लग गई।क्यूंकि बढ़ते बढ़ते ऊपर जाने की बजाय वो घूम फिर के फिर चमड़ी तक आने लगा था ।
उसको डर लगा। डरने पे कोई भी सोचने लगता है । जब लगे फटने ,प्रसाद लगे बंटने ।
“मै क्यों हूँ ?
कहाँ से आया हूँ ?
कहाँ जाऊंगा ?
मेरा इस दुनिया में क्या रोल है ?”
तरह तरह के जवाब मन में आने लगे ।
“मैं नहीं होता तो कुछ न कुछ तो रुक जाता काम दुनिया का “
साले सवाल  भी इतने झान्टू है कि जवाब है कहाँ इनके ?
जिस सवाल का एक जवाब नहीं होता ,उसके कई जवाब बन ही जाते है । 
“पास वाले शिखर को छूना ही हमारे होने का मकसद है । “किसी ने कहा ,आधे आलसी उसके पीछे हो लिए .
“पास वाली खाई की तली में परम सुख है ।”कोई बोला ,आधे उसके पीछे लग गए ।
दो चार बाल किसी छोटे मोटे हादसे में उखड के शिखर पे लटक गए या तली में सरक गए ।
सबको लगा वो कहीं पहुँच गए । उनकी कहानियां चलने लगी । कुछ ने तो उनके तावीज़ गले में लटका लिए ।
इधर छोटू खूब बढ़ने में लगा था ,”एक दिन इस लम्बू के सर पे चढ़ के नाचूँगा ।”
और लम्बू बेचारा गोल गोल चक्कर में उलझ के रह गया था ।
छोटू उससे लड़ने भिड़ने जा रहा था ,उधर लम्बू अब खुद छोटू को गले लगाने आ रहा था ,
इतने में ,…………………

……………………………,
एक रेज़र आया
और सब साफ़ ।
वो सब अपने अपने होने पर इतराते थे ।
उनको क्या पता था कि  हमारे होने से ही खुजली और बदबू होती है ।
उनके साफ़ होने पर असली दुनिया की असली खूबसूरती नज़र आती है । 

इतनी बड़ी धरती पे इन्सान की कहानी कुछ ऐसी ही चल रही है आज कल ।
अपने  भीतर या अपने  आस पास  इतने सिकंदर दिखते  है कि यही शब्द सटीक लगा बेहोशी तोड़ने को ।

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