AASMANO ME

AASMANO ME

आसपास  न देखी तो ढूंढी फसानो में  

थी नही जमी पर गए आसमानों में । 
जगह-जगह जा के ख़ुशी ढूंढते रहे 
मैकदों  में,महफ़िलो में और मकानों में । 
कोई हो जो स्वाद भी इसका चखे जरा 
प्यार को सबने सजाया मर्तबानों में । 
दाम चस्पा हो गए हर शै पे दुनिया की 
घर के बदलते जा रहे है क्यू दुकानों में । 
जज्बात गायब देख के हमको यही लगा 
इंसां क्या बनने लगे है कारखानों में । 
क्या करे उकता गये है अक्लमंदो से 
इसलिए हम हो गए शामिल दिवानो में । 
FROM 
“DIL TO DIL HAI” 
BY PANKAJ JAIN@ ALL RIGHTS RESERVED
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